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Day: July 26, 2021

“पागल फ़क़ीरा” की एक ग़ज़ल  … मैंने घर वापसी का कभी ऐसा मंज़र नहीं देखा…

“पागल फ़क़ीरा” की एक ग़ज़ल … मैंने घर वापसी का कभी ऐसा मंज़र नहीं देखा…

राष्ट्रीय
"पागल फ़क़ीरा" भावनगर, गुजरात ------------------------------- मैंने घर वापसी का कभी ऐसा मंज़र नहीं देखा, दिल में गड़ा है जो वो यादों का खंडहर नहीं देखा। हिजरत करने वालों के ऊपरी ज़ख़्म देखने वालों, आपने कभी राहगीरों के घाव के अंदर नहीं देखा। इतनी मुश्किल हालातों के बीच भी हिन्दुस्तान में, कभी इन्सानियत की ज़मीन को बंजर नहीं देखा। मजबूर है पर मग़रूर नहीं देखा मज़दूर को कभी, ग़रीबी में भी उनकी आँखों में समन्दर नहीं देखा। मुझे तो आश थी सिर्फ़ अपने ही एक वफ़ादार की, "फ़क़ीरा" ने आस्तीन में छुपा वो खंज़र नहीं देखा।...
“पागल फ़क़ीरा” की एक ग़ज़ल    … मेरी फ़ज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है…

“पागल फ़क़ीरा” की एक ग़ज़ल … मेरी फ़ज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है…

राष्ट्रीय
"पागल फ़क़ीरा" भावनगर, गुजरात --------------------------------   मेरी फ़ज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है, वहाँ हो तुम यहाँ पे हम बेक़रार आज भी है। मेरी फ़ज़र को तेरा.......... वो शोखियाँ वो अदायें के तुम दिखे थे वहाँ, तेरी अदा का वहीं पर निग़ार आज भी है। मेरी फ़ज़र को तेरा.......... न चाहे सोच के क्यों तुमको ये हुआ अरमान, फ़िर मेरे तन पे चली तलवार आज भी है। मेरी फ़ज़र को तेरा.......... ओ यार तेरे लिये हमने तोड़ दी बेड़ियाँ, जफ़ा की बात पे पागल वो यार आज भी है। मेरी फ़ज़र को तेरा.......... हटी नहीं है नज़र नाज़ वो ये करता है, मेरे कलाम से शायद अग़्यार आज भी है। मेरी फ़ज़र को तेरा.......... न पूछ किसने सोहबत में नज़्म गाये है, कि तुमको छोड़ के हम सोग़वार आज भी है। मेरी फ़ज़र को तेरा.......... फ़क़ीरा ये ज़िन्दगी हमको न रास आई है, लगाने गले हम मौत को तैयार आज भी है। मेरी फ़ज़र को ...

चलो चले गांव की ओर… आठवीं किश्त… गुरु जी थोड़ा और कुटाई-पिटाई करते तो मैं ज्वाइंट डायरेक्टर नहीं डायरेक्टर बनता

राष्ट्रीय
नीरज नैथानी रुड़की, उत्तराखंड चलो चले गांव की ओर..... गतांक से आगे... आठवीं किश्त भुळा वो भी क्या दिन थे गांव में, गरीबी तो थी पर रिश्तों की अमीरी भी थी। हम सभी मिलजुलकर रहते थे। खेलना, कूदना, लफंडरी, लड़ाई झगड़ सब होता था पर प्यार मुहब्बत में भी कोई कमी न थी। तू तो मुझसे दो क्लास पीछे था बोडा ने मन्ना से मुखातिब होकर कहा। अब्बे छठी सातवीं तक हम साथ पढ़े हैं तू भूल गया रे, मैं एक बार सातवीं में लुढ़क गया तू आगे बढ़ गया, फिर दूसरी बार मैं दसवीं मे भी फेल हुआ तब तू दो क्लास आगे हो गया मन्ना ने बचपन के पन्ने पलटते हुए कहा। क्या दिन थे यार गुरु जी के लिए लौकी ले जाना, हरी सब्जी ले जाना, कभी-कभी मां घी का डिब्बा भी देती भूरा ने तीसरे पैग को दम्म से हलक में उतारते हुए यादों का सीन खींचा। वो दाणि गुरु जी तो अब क्या ही बचे होंगे, जब हम ही इतना बूढ़े हो गये हैं, बोडा ने सेब की फां...