Saturday, June 20News That Matters

Day: July 23, 2021

कल्पना बहुगुणा की एक कविता…. नित बनी रहे किसान की आन बान और शान…

कल्पना बहुगुणा की एक कविता…. नित बनी रहे किसान की आन बान और शान…

राष्ट्रीय
कल्पना बहुगुणा देहरादून, उत्तराखंड ------------------------------------------ किसान --------------------- विकट देश का मेरे मेहनत करता सबल किसान। कठिन देश का मेरे हिम्मत रखता सरल किसान। भव्य देश का मेरे पौरुष रखता सफल किसान। हिम प्रदेश का मेरे साहस करता अटल किसान। अपनी स्वस्थ भुजाओ में बल रखता वह जोड़। खेत बनाता जिनके द्वारा पथरीली चट्टाने तोड़। उसके जीने का अधिकार कर्म निरत रहता है। जन्म भूमि का पावन प्यार ह्रदय में जिसके रहता है। हुआ न तनिक अधीर पड़े भयंकर संकट कभी। हिम्मत से लड़ा रात दिन बटोर साहस विघ्नों को चीर। नित सुखी रहे किसान की बैलो की जोड़ी बलवान। नित बनी रहे किसान की आन बान और शान। होगा जब किसान का खेत और खलिहान खुशहाल। होगा तब देश का विकास और देश खुशहाल। @ कल्पना बहुगुणा...

चलो चले गांव की ओर… पांचवी किश्त… अमा यार वो नत्था नहीं.. नेपालियों की कच्ची बोल रही थी…

राष्ट्रीय
नीरज नैथानी रुड़की, उत्तराखंड ------------------------------------- चलो चले गांव की ओर... गतांक से आगे... पांचवी किश्त चली गयी चौकड़ी दारू पीकर पत्नी ने कमरे की सफाई करते हुए बोडा को ताना मारा। अमा यार तू भी..., साल भर में एक बार गांव आना होता है भाई बंधो के पास, दो घड़ी बैठ लिए तो कौन सा जुल्म कर दिया। बात बैठने की नहीं है ताई तमतमाते स्वर में बोली। तो फिर क्या बात है, आगबूला क्यों हो रही हो? क्या-क्या बोले जा रहे थे नशे की झोंक में, मैं बगल में सब सुन रही थी ताई का आवेश कम होने वाला नहीं लग रहा था। क्या बोला मैंने, नशे की लहर में बोडा का पौरुष भी बैकफुट में आने को तैयार न था। मैं दिलाता हूं नत्था को हरियाणा से चार जर्सी गाय, उससे कहो गाय पाले, गांव में डेरी खोले .. मैं हार्टीकल्चर व फौरेस्ट डिपार्टमेंट में भी बात करूंगा, वहां से पौध दिलवाऊंगा, उससे कहो फलदार वृक्ष लगाए,...
युवा कवि आचार्य मयंक सुन्द्रियाल की रचना… रत्न प्रभा सी भाषित होती

युवा कवि आचार्य मयंक सुन्द्रियाल की रचना… रत्न प्रभा सी भाषित होती

राष्ट्रीय
आचार्य मयंक सुन्द्रियाल पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड ----------------------------------------------- रत्न प्रभा सी भाषित होती वह तरणी के तट जो तीर धवल वर्ण की पारदर्शिता हिमखंडों से जस छलकता नीर।।१।। दीर्घ केशों का वह उलझन दरबान बनी हैं मुख पे लटकन मृगनयनों से तो अहर्निश छूटते हैं मन्मथ के वो तीर ।।२।। रत्न प्रभा.......... निशिकर मानो दिवस दिप्त हो प्रभाकर सा स्वर्गिक पुंज लिए दो सूर्य खिले हैं आज व्योम में उस उपत्यका के सम तीर ।।३।। रत्न प्रभा....... क्या एक हुये हैं धरती अंबर या अरूणप्रिया कोई उतरी है ब्रह्म लावण्य भी रिक्त हुआ जो रूप कपोलों में दधिसार।।४।। रत्न प्रभा...….. सहसा झोंका वो हवा का चेतना के स्वर ले आया है मेघा की बूंदों से सिंचित होता तन मन मेरा उस तरणी के तीर ।।५।। रत्न प्रभा......  ...