चलो चले गांव की ओर….. तीसरी किश्त… टुर्रा चिल्लाया, बौत बने हैं आज गांव वाले
नीरज नैथानी
रुड़की, उत्तराखंड
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चलो चले गांव की ओर.......गतांक से आगे..... तीसरी किश्त
कल शाम को खाना खाने के बाद सारे गांव वाले मंदिर प्रांगण में बैठे गपशप मार रहे थे। पास में पीपल के पेड़ की शाखाएं हवा में लहरा रही थीं। खुशनुमा हवा के झोकों से तन-मन प्रफुल्लित हो रहा था। बच्चे आंगन में खेल-कूद कर रहे थे। गांव तो भई गांव है, देहरादूनी काका ने मस्ती भरी अंगड़ाई लेते हुए कहा।
प्रदूषण भरे शहरों में ऐसी शुद्ध हवा कहां मिलती है, गर्मी में दम घुटता है दिल्ली वालों ने व्यथा प्रकट की। तभी निचले चौक में हल्ला सुनाई दिया।कोई जोर-जोर से चिल्लाकर हुड़दंग कर रहा था।
कौन है? अरे ये टुर्रा है बोडी का, कच्ची पीकर आया होगा नेपालियों के यहां, इसका रोज का यही धंधा है।
बिथ्याणी बोडी का पैंतीस वर्षीय लड़का टुर्रा बेरोजगार था। पिता बचपन में ही गुजर गए ...





